मेरा राजस्थान My Rajasthan

कान पर हाथ रख लो चाहे मैं तो चिल्लाता रहूँगा

Thursday, May 18, 2006

ऐसा भी होता है

कभी कभी एसा होता है कि मन करता है कि चिठ्ठे पर कुछ लिखा जाए और कुछ सूझता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं सबके साथ होता होगा। हम सभी के साथ कभी न कभी ऐसा वक्त आता है जब हम लिखना चाहते हैं और यह तक नहीं सोच पाते कि विषय क्या होना चाहिये। और जब विषय ही नहीं हो तो लिखें क्या खाक। विषय ढूढंने के लिये समाचार पत्र देखतें हैं या टीवी। फिर भी विषय तलाशने में असफल होते हैं। ऐसे में क्या करे चिठ्ठाकार।
क्या लिखे वो?
आज मेरे साथ यही समस्या हुई। लिखने की इच्छा हुई और विषय नहीं ढूंढ पाया कि किस पर लिखा जाए।
तब मुझे एक आईडीया आया।
मैने सोचा कि जब कुछ नहीं आरहा तो क्यो न दुसरों के चिठ्ठे पढूं।
और जब चिठ्ठे पढे तो सोचा कि क्यों न इसी विषय पर लिख दुं कि विषय नहीं मिल रहा है।
और ठोक दी यह पोस्ट।
अब किसी को इसे पढकर मजा आये न आये, मुझे तो लिखने में बहूत मजा आया।
झेलो भई झेलो
हा हा हा

Tuesday, May 16, 2006

आरक्षण किसी का हक नहीं है

चलो आप यह बात तो स्वीकार करते हैं कि दलितों का सामाजिक स्तर ऊंचा नहीं हुआ है।
अब मैं आपके प्रश्नों के जवाब देता हूँ।
मेरी पिछली पोस्ट में मेरे चिठ्ठाकार भाईयों ने कमेंट्स किये।
उनमें से आशीष जी ने कुछ प्रश्न किये, कुछ प्रतीक ने छाया भाई ने आरक्षण का विरोध किया तथा सृजन शिल्पी ने समर्थन किया। अब मैं आरक्षण विरोधियों के तर्कों के उत्तर देने के प्रयास करूंगा।

"""१.माना दलितो को आरक्षण नौकरी के लिये चाहिये, अब उन्हे पदोन्नति के लिये आरक्षण क्यों चाहिये ?"""
आशीष जी आरक्षण दलितों का सामाजिक स्तर सुधारने के लिये किया गया प्रयास है। पदोन्नति के लिये आरक्षण भी इसी कार्य का एक हिस्सा है। जिससे कि उंचे पदों पर भी पिछडी जातियों के लोग आयें ओर उनका प्रतिनिधित्व करे।

"""२.दलितो को शिक्षा के लिये आरक्षण दे दिया, पढ लिख गये, अब उच्च शिक्षा के लिये आरक्षण क्यो चाहिये ?"""
आरक्षण का प्रमुख उद्देश्य दलितों को शिक्षित करना है अब इसमें आप ये कहैं कि दलित को तो सिर्फ साक्षर करदो, तो फिर बाकी पढाई की भी क्या जरुरत है। दलित अपने स्तर पर किये प्रयासों द्वारा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता है क्योंकि अकसर दलित गरीब होता है।

"""३.पिता ने आरक्षण के द्वारा नौकरी पा ली, अब बच्चे को आरक्षण क्यों चाहिये ?
इसका जवाब बहुत आसान है। - पूत्र जिन्दगी भर पिता पर बोझ नहीं बन सकता, उसको भी घर को चलाना ही पडेगा। पिता के जमाने के कॉम्पीटीशन में ओर अभी के में कितना अन्तर है ये सभी जानते हैं। प्रतियोगिताओं में आरक्षित वर्गों कि मेरिट उंची होना प्रमाण है कि कॉम्पीटीशन बढ गया है। इसलिये बच्चे को आरक्षण की आवश्यकता है। हमारे देश में पिता का राशन कार्ड में नाम होने के बावजूद पुत्र व्यस्क होने पर अपना राशन कार्ड अलग बनाता है क्योंकि उसका संघर्ष उसका अपना होता है।

"""५.आप अपने आसपास मे आरक्षण द्वारा लाभित ऐसे व्यक्ति का नाम बता दिजिये जिसने अपनी जाति के उद्धार के लिये काम लिया हो ?
ऐसे हजारों लाखों लोग है जो अपनी जाति के उद्धार के लिये प्रयासरत हैं। जिनके नाम कोई नहीं जानता जिनके प्रयास कोई नहीं जान पा रहा।
कितने ही ऐसे भारतीय हैं जिन्होने स्वतंत्रता के आंदोलन में सक्रीय भुमिका निभाई पर क्या हम सबके नाम जानते हैं। हां पर मैं अवश्य ऐसे कई व्यक्तियों और संस्थाओं को जानता हूं जो अपनी जाति के उद्धार के लिये कार्य कर रहैं है।

"""६.किसी भी छात्रावास मे जाइये और किसी से भी पूछिये कि सरकार द्वारा दी जाने वाली स्कालरशीप के पैसो का ये छात्र क्या उपयोग करते है ?
मेरा आधा जीवन छात्रावास में गुजर गया। मैं जानता हूं कि किस प्रकार छात्र अपनी स्कालरशिप का उपयोग करता है। कुछ लोगो के गलत उपयोग को देखकर सभी को गाली नहीं दी जा सकती। लडके अपनी किताबें ओर साल भर के एक जोडी कपडे स्कालरशिप से खरीदते हैं। दलितों की स्थिती देखने के लिये उनमे रहना आवश्यक है।

"""७. आपके अनुसार मौजुदा आरक्षण व्यवस्था ने ५७ साल मे कुछ नही किया (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है), लेकिन क्यो ? क्या यह वर्तमान व्यवस्था की असफलता नही है ?
ये आपने सबसे अहम सबाल किया आशीष जी तथा ये प्रश्न मैने कई लोगों के मुह से सुना और पढा है।
इसके जवाब में मैं यह कहना चाहता हूं कि इतने सालों में आरक्षण व्यवस्था कुछ तो किया है। हां ज्यादा असर नहीं हुआ तथा (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है) लेकिन यह व्यवस्था कि असफलता नहीं है। व्यवस्था अपना कार्य कर रहीं है परन्तु इसकी गती धीमी है।
यदी कोई दवा किसी रोग को अत्यंत धीमे ठीक कर रही है और उसका असर नजर नहीं आरहा तो दवा बन्द नहीं की जाती बल्की उसकी मात्रा में ईजाफा कर दिया जाता है, रोगी को मरने के लिये नहीं छोड दिया जाता। एक और उदाहरण लो हमारा कोई कार्य सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही के कारण यदी धीमी गती से होता है या फिर होता ही नहीं है तो क्या हम प्रयास बन्द कर देते हैं। नहीं ना। तो फिर आरक्षण भी धीरे धीरे असर कर रहा है।

और प्रतीक भाई मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ कि वर्गों के मध्य संघर्ष तो सदियों से इस देश में चलता आरहा है, आरथक्षण से वह नहीं बडेगा। आरक्षण से दलितों की सामाजिक हैसियत मे सुधार आएगा। हां अन्य वर्ग उनकी ईज्जत करेंगें इसका मैं नहीं कह सकता। हां इतना कह सकता हूं कि जब तक इज्जत नहीं होगी आरक्षण मिलता रहेगा।
हो सकता है आने वाले 25 वर्षों में सभी वर्ग समान हो जाए तो तब इस आरक्षण कि जरूरत नहीं पडे। सृजन शिल्पी ने मेरे पोस्ट पर लिखा है कि यदि सामाजिक व्यवस्था के कर्णधारों ने संविधान के प्रावधानों को लागू करने में ईमानदारी और सदाशयता दिखाई होती तो शायद वैसे हालात काफी पहले ही पैदा हो सकते थे, और आरक्षण समाप्त हो सकता था।
आरक्षण योग्यता को नहीं खा रहा हैं बल्कि छुपे हुए योग्यता का विकास कर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरक्षण किसी का हक नहीं है बल्कि यह तो प्रयास है पिछडों को उबारने का।

 

Wednesday, May 10, 2006

क्या वाकई में भारत में आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो गया है?

Wednesday, May 03, 2006 को मैनें मेरे चिठ्ठे आज का सवाल पर एक प्रश्न किया था कि क्या भारत में आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध होगया है?
और मुझे ramu_ag@yahoo.com द्वारा जवाब मिला था कि
"""अ.जा./अ.ज.जा. के कुछ व्यक्ति वर्तमान उच्च पदों पर हैं, कुछ अत्यन्त धनवान हैं, कुछ करोड़पति अरबपति हैं, फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, ऐसे सम्पन्न लोगों के लिए आरक्षण सुविधाएँ कहाँ तक न्यायोचित है? कब तक चलेगा ऐसा?"""
इसके बाद मैने कई चिठ्ठे पढे जो आरक्षण का विरोध कर रहै हैं। देश में आरक्षण का नाग फुंफकार रहा है, नेता जी ने आग को हवा दे है। जितना मैं पढ सका उतना पढने के बाद मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं या कि आरक्षित लोगों का। अभी दिल्ली में मेडिकल के छात्रों ने जुते साफ किये, झाडू लगाया।
मेरा कहना है कि जुते साफ करने वालों तथा झाडू लगाने वालों को अपमानित करना कहां तक न्यायोचित है?
ramu_ag@yahoo.com का कहना है कि आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो चुका है।
मैं सभी से पूछना चाहता हूं कि क्या वाकई में क्या वाकई में SC, ST, OBC में आने वाली जातियों का सामाजिक स्तर उठ गया है। क्या वाकई में इन लोगों को समाज में इज्जत की नजर से देखा जाता है?
आज सुबह जब मैं घर के बाहर आया तो मैने देखा कि हरिजन झाडू लगा रही थी और साथ में कचरा ट्राली लेकर चल रही थी मेरे पडोस की सभी महिलाएं ज्यादातर ब्राह्मण, जैन, राजपूत, वैश्य इत्यादी दो फीट दूर से ट्रोली में कचरा फैंक रहीं थी। थोडी देर बाद जब वो रोटी लेने आयी तो सारी महिलाएं उस हरिजन महिला के टोकरे में दूर से ही रोटीयां फैंक रही थी। वो महिलाएं उस हरिजन महिला के छूना नहीं चाहती थी। इसलिये दूर से ही रोटियां फैंक रहीं थी।
और ये घटना पूरे देश में रोज सवेरे घटती है।
तो फिर कहां से लोगों को लगता है कि इन लोगों का सामाजिक स्तर बढ गया है।
लोग उसके छूने से डर रहै हैं कि कहीं अपवित्र न हो जाए, क्योंकि वो मल मूत्र साफ करके आयी है।
मैं आपको एक द्श्य दिखाता हूं।
सोचिये कि एक ऐसा ब्राह्मण जो छूआछूत करता हो घायलावस्था में हाई-वे पर पडा है तथा दूर दूर तक कोई नजर नहीं आरहा और थोडी देर बाद एक ओर से कंधे पर झाडू उठाए एक हरिजन आरहा है वह घायल को देखते ही उसे बचाने कि सोचता है तथा घायल को कंधे पर उठाकर ले जाता है तो क्या वो घायल ब्राह्मण हरिजन से मना करेगा कि मुझे मत छू, पहले नहाकर आ?
आज भी देश के कई हिस्सों में रोज दलितों का अपमान होता है।
तो फिर कहां से इनका सामाजिक स्तर बढ गया है?
आज भी राजस्थान में कई जगह दलित दुल्हों को घोडी से उतार दिया जाता है।
क्या दलित हिन्दु नहीं है, क्या उन्हे घोडी पर बैठने का हक नहीं है ?
एसे ही कई कारण है जिस वजह से सरकार ने आरक्षण का प्रावधान कर इनका सामाजिक आर्थिक स्तर उठाने का कदम उठाया था।
राजस्थान की आज की खबर ही लो (सोजन्य से दैनिक भास्कर)
अल्लाह बख्श, जालोर, 9 मई। तिलोडा के राजकीय विध्यालय में मेघवाल समाज के पांच बच्चे पढ रहै हैं, जिनको विधालय के अध्यापक और प्रधानाध्यापक प्रताडित करते हैं, तथा जातिसूचक गालियां देते हैं। जब बच्चों ने ये बाते घर पर बताई तो  बच्चों के दादा अध्यापकों से मिले तो अध्यापकों ने उनके साथ भी गाली गलोज की।
दादा फिर कलेक्टर से मिले।
तथा अब जांच बैठा दी गई है।
पता नहीं क्या होगा इस जांच का?
इस देश के हर शहर गांव में कभी न कभी इस तरह की घटनाएं होती रहती है तो फिर कहां से आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो गया है।
लोग कहते हैं कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये जिससे कि वाकई में गरीबी दूर होगी(मेरा भी यही मानना है)।
लेकिन मैं ये कहता हूं कि ये कोन तय करेगा कि फलाना व्यक्ति गरीब है। जाहिर है कि ये कार्य सरकारी तंत्र द्वारा किया जाएगा तो क्या विश्वास किया जाए कि सरकारी लोग सही कार्य करेंगे।
पूरे देश में BPL सूचियां बनाई गयी लेकिन इसमें कई अमीरो ने भी अपने नाम जुडा लिये हैं।
सब ये जानते हैं कि फलानी जाती वाकई में निम्न जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। तो इसीलिये आरक्षण का आधार जातिगत रखा गया क्योंकि आज भी इस देश में कुछ लोगों को निम्न जाति का कह कर हैय द्ष्टी से दैखा जाता है।
आखिर में
मेरा मानना यह है आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है।

Monday, May 08, 2006

खतरनाक बुढ्ढा Part Two (बुढ्ढों से सावधान) Harmful Oldman

आखिरकार हम अपनी हंसी को दबा नहीं पाये और सारे जोर जोर से हंसने लगे। बुढ्ढा भी अचकचाता हुआ नींद से जागने का नाटक करते हुए उठा।
उसने हमारी तरफ देखा, हम उसकी तरफ देखकर हंस रहै थे। तभी उसने आगे वाली सीट पर देखा तो पाया कि आगे तो लडका बैठा है। बेचारा बडा शर्मिंदा हुआ।
कोटा पहुंचने पर मैं लडकी के पास गया ओर मैने कहा कि क्या ये बुढउ तुम्हे परेशान कर रहा था तो उसने हामी में सर हिला दिया।
मैने उससे कहा कि जब हम कह रहै थे कि कोई परेशान कर रहा है तो फिर क्यों जवाब नहीं दिया। तो वो कुछ नहीं बोली। मैने उससे कहा कि "तुमने कुत्तों से सावधान" सुना होगा, अब नया सुनो बुढ्ढों से सावधान।
लडकी से मैने कहा कि यदी यही छेडखानी कोई लडका कर रहा होता तो तुम अभी तक उसके जूते पडवा देती फिर तुमने उसे क्यों बख्शा। लडकी निरुत्तर रही।
मैने आखिर उससे कहा कि अच्छा चलते हैं।
और मैं घर आगया अच्छी अच्छी यादें लिये।
 

Sunday, May 07, 2006

खतरनाक बुढ्ढा (बुढ्ढों से सावधान) Harmful Oldman

दोस्तों यदी किसी ने इससे पुर्व के पोस्ट पढे हों तो उन्हे याद ही होगा किस प्रकार मेरी कोटा से रोहतक की यात्रा रही तथा किस प्रकार वहां पर बारात में मेरे साथ वो अजीबोगरीब घटना घटी।
अब आगे का हाल
जैसा कि टाईटल से लग रहा है इसमें किसी बुढ्ढे का जिक्र होगा। सच में ये एक बुढ्ढे की ही दास्तान है।
कोटा जाने के लिये हमने दोबारा उसी जनशताब्दी एक्सप्रेस को चुना। जाते समय हम चार मित्र थे। गाडी हजरतनिजामुद्दिन से कोटा के लिये रवाना हुई। जिसने भी इस गाडी में सफर किया हो उसे याद होगा कि इस गाडी में बैठने की व्यवस्था बस की भांति होती है। यानी तीन सीटें इधर और तीन उधर। हम चारों में से तीनों तो साथ बैठ गये और एक पास वाली पर बैठ गया। हमारे पास सोनी का केमकोर्डर था।
हमारे आगे वाली सीट पर दो बुजुर्ग महिलाएं तथा उनके साथ एक बुजुर्ग व्यक्ति था। उनकी बातों से हमें पता चला कि दोनो महिलाओं में से एक तो उस आदमी की पत्नी थी तथा एक बहन।
यही था वो खतरनाक बुढ्ढा
इस व्यक्ति की आयु 65 के आसपास होगी। मगर इसका दिल जवान था इसका सबूत उसने थोडी देर बाद दिया। जैसे ही ट्रेन ने अपनी गती पकडी बुढ्ढे ने अपनी सीट छोड दी तथा बाजु वाली दुसरी सीट पर बैठ गया।
उसके आगे वाली सीट पर एक लडकी बैठी हूई थी जो रिलायंस के मोबाईल से खेल रही थी। हमारा एक मित्र बडी आरजू से उसको निहार रहा था पर वो थी कि पलटने का नाम ही नहीं ले रहीं थी।
मेरा दोस्त कमेंट कर रहा था कि रिलायंस तो बैकार नेटवर्क है हमारे पास तो एअरटेल है।
तभी एक अजीब घटना घटित हूई।
हम सब ने नोट किया।
हम क्या देखते हैं कि बुढ्ढे ने आगे वाली सीट की पुश्त पर सिर टिका लिया ओर सोने लगा था मगर उसका हाथ सीट की पुश्त के भी आगे जा रहा था।
लडकी के शरीर से मात्र कुछ ही दूरी पर था उसका हाथ।
हमने एक दुसरे की और देखा फिर सोचा कि ऐसे ही चला गया होगा बुढ्ढे का हाथ। नींद में होगा।
तभी हमने एक हरकत और देखी हमने देखा कि बुढ्ढे ने अपना हाथ एक इंच और आगे बडा दिया था और उसकी उंगलियां लडकी की पीठ को छूने लगी थी।
हमारा दिमाग खराब हो गया।
हमें बुढ्ढे पे गुस्सा आने लगा। गुस्सा आने का कारण नहीं बताउंगा बस गुस्सा आने लगा।
बुढ्ढे ने धीरे धीरे करके अपनी सारी उंगलिंया लडकी के सटा दी, और उन उंगलियों को गडाने लगा। हमने सोचा कि इस लडकी को पता नहीं चल रहा है क्या इसकी हरकतों का।
तभी मेरे दोस्त ने कमेंट पास किया कि "यदी कोई रिलायंस पे मिस्डकाल मार रहा हो तो बेहीचक एअरटेल को समस्या बताई जा सकती है एअर टेल समस्या का निदान करेगी।"
मगर लडकी की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। हमने फिर कमेंट किया "लगता है लडकी को ही मजा आरहा है"
वास्तव में हम चाहते थे कि वो लडकी हमसे कहे और हम बुढ्ढे को सबक सिखा दें परन्तु जब तक लडकी नहीं कहती अपन कायको चलता सेंटर में लें।
बुढ्ढा सारी बातों से बेखबर अपना काम किये जारहा था। मैने भी सोचा कि उंगलिया अडाके ही खुश हो रहा है साला।
एक बुजुर्ग तो वो होता है कि जिसके सफेद बाल देखते ही हम उसकी ईज्जत करते हैं और एक ये साहब थे जिन पर हमें क्रोध आरहा था।
तभी हमने देखा कि बुढ्ढे की उंगलियों से परेशान होकर लडकी दायीं ओर सरक गयी थी, बुढ्ढे को पता नहीं चला वो हवा में ही अपनी उंगलियां चलाता रहा। तभी बुढ्ढे ने अपनी आंखे खोली और अपनी सीट से खडा होगया तथा हमें घूरने लगा। उसने जेब में हाथ डाला और प्लास्टिक की छोटी सी शीशी निकाली, हाथ में उडेली तो उसमें से छोटी छोटी गोलियां निकली। तीन चार गोलियां उसने मुंह के हवाले करदी। और उसके बाद साहब बाथरुम को रवाना होगये।
करीब दस मिनट के बाद वापस आये और मोर्चा संभाल लिया।
बुढ्ढे ने देखा कि लडकी दायीं ओर खिसक गई है तो उसने अपना हाथ दो सीट के बीच वाली जगह पर फंसा दिया और फिर से लडकी को छूने लगा।
हमने सोचा कि इस बार तो बुढ्ढा पिटा, अभी लडकी चिल्लाएगी ओर फिर बुढ्ढे का क्या होगा भगवान ही मालिक है।
लेकिन आश्चर्य लडकी ने कुछ भी नहीं कहा। हमने चाय बेचने वाले की तरह आवाज लगाई कि क्या किसी को मदद चाहिये। परन्तु लडकी ने कोई मदद नहीं मांगी। बेचारी लडकी फिर से बांयी ओर खिसक गई तो बुढ्ढा फिर से बांयी ओर से हाथ चलाने लगा। मैने सोचा कि लडकी शायद घबरा रही है। आखिर कार लडकी आगे की ओर झुककर बैठ गई। अब फिर से बुढ्ढे का हाथ हवा में था। उसकी उंगलिया लडकी के शरीर को खोज रही थी, और हम उसकी उंगलियों की हरकतों को देखकर क्रोध में उबल रहै थे।
बुढ्ढा परेशान हो गया क्योंकी लडकी आगे झुककर बैठ गई थी। बुढ्ढा व्यग्र हो रहा था। कि तभी वेटर आया लडकी ने खाने के लिये कुछ खरीदा और भूलवश फिर से पीछे टिककर बेठ गई। बुढ्ढे की फिर से चारों उंगलिया घी में और सर कढाई में होगया। यानी बुढ्ढा फिर से शुरु होगया।
अब हम केमरे से उसके हाथ की फिल्म उतारने लगे।
लडकी फिर से परेशान होने लगी, हमसे मदद भी नहीं ले रही थी। वो कभी दायें होती कभी बायें और बुढ्ढे मिंया भी। गजब का नींद का नाटक कर रहा था बुढ्ढा।
जैसे ही कोई रेल्वे स्टेशन आता उठ जाता और गाडी रवाना होते ही झट से सोजाता ओर फिर काम चालु।
आखिरकार
लडकी ने पास बैठे लडके से कुछ कहा।
हमने सोचा कि अब तो बुढ्ढा गया,
लेकिन हुआ कुछ और ही था। लडका अपनी सीट से खडा हूआ ओर लडकी भी तथा दोनो ने आपस में सीटें बदल ली।
मजे वाली बात ये थी कि बुढ्ढे को इस बात का पता नहीं चला। बुढ्ढा अपना हाथ चलाता रहा। अब बुढ्ढे को क्या पता कि लडकी उस जगह लडके को बैठा गई है।
आगे का पुर्वानुमान लगालगा कर हम लोटपोट हुए जा रहै थे। हम सोच सोच कर कहकहे लगा रहे थे कि अब बुढ्ढा अनजाने में लडके के उंगला करेगा।
कसम से हंस हंस के मेरा तो बुरा हाल हो गया। मेरा एक दोस्त पेट पकड पक़ड के हंस रहा था।
तभी मैने हंसते हूए कहा कि चुप रहो चुप रहो देखो कैसा मजा आता है।
बैचारा लडका
उसे क्या पता था कि लडकी उसे कहां बैठा गई है।
तभी बुढ्ढे ने अपनी उंगलीयां आगे बडाई हम अपनी हंसी रोकने के लिये जबडा भींच कर बैठ गये। बुढ्ढे ने उंगलियां और आगे बडाई ओर एक उंगली अडा दी।
लडके ने गोर नहीं किया। वो और पीछे सट कर बैठ गया।
बुढ्ढे ने अपनी उंगलिया और गडाई। तभी लडके ने पलट कर देखा। उसने बुढ्ढे का हाथ देखा, फिर हमें देखा कि हम किस प्रकार हंसी को दबा रहै थे। बुढ्ढे ने नींद का नाटक करते हुए और जोर से उंगलिया गडाई लडके ने उसके हाथ को फिर से देखा फिर हमें देखा। बेचारे को काटो तो खुन नहीं, समझ गया कि लडकी के साथ क्या हो रहा होगा।


शेष फिर...........

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