"""अ.जा./अ.ज.जा. के कुछ व्यक्ति वर्तमान उच्च पदों पर हैं, कुछ अत्यन्त धनवान हैं, कुछ करोड़पति अरबपति हैं, फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, ऐसे सम्पन्न लोगों के लिए आरक्षण सुविधाएँ कहाँ तक न्यायोचित है? कब तक चलेगा ऐसा?"""
इसके बाद मैने कई चिठ्ठे पढे जो आरक्षण का विरोध कर रहै हैं। देश में आरक्षण का नाग फुंफकार रहा है, नेता जी ने आग को हवा दे है। जितना मैं पढ सका उतना पढने के बाद मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं या कि आरक्षित लोगों का। अभी दिल्ली में मेडिकल के छात्रों ने जुते साफ किये, झाडू लगाया।
मेरा कहना है कि जुते साफ करने वालों तथा झाडू लगाने वालों को अपमानित करना कहां तक न्यायोचित है?
मैं सभी से पूछना चाहता हूं कि क्या वाकई में क्या वाकई में SC, ST, OBC में आने वाली जातियों का सामाजिक स्तर उठ गया है। क्या वाकई में इन लोगों को समाज में इज्जत की नजर से देखा जाता है?
आज सुबह जब मैं घर के बाहर आया तो मैने देखा कि हरिजन झाडू लगा रही थी और साथ में कचरा ट्राली लेकर चल रही थी मेरे पडोस की सभी महिलाएं ज्यादातर ब्राह्मण, जैन, राजपूत, वैश्य इत्यादी दो फीट दूर से ट्रोली में कचरा फैंक रहीं थी। थोडी देर बाद जब वो रोटी लेने आयी तो सारी महिलाएं उस हरिजन महिला के टोकरे में दूर से ही रोटीयां फैंक रही थी। वो महिलाएं उस हरिजन महिला के छूना नहीं चाहती थी। इसलिये दूर से ही रोटियां फैंक रहीं थी।
और ये घटना पूरे देश में रोज सवेरे घटती है।
तो फिर कहां से लोगों को लगता है कि इन लोगों का सामाजिक स्तर बढ गया है।
लोग उसके छूने से डर रहै हैं कि कहीं अपवित्र न हो जाए, क्योंकि वो मल मूत्र साफ करके आयी है।
मैं आपको एक द्श्य दिखाता हूं।
सोचिये कि एक ऐसा ब्राह्मण जो छूआछूत करता हो घायलावस्था में हाई-वे पर पडा है तथा दूर दूर तक कोई नजर नहीं आरहा और थोडी देर बाद एक ओर से कंधे पर झाडू उठाए एक हरिजन आरहा है वह घायल को देखते ही उसे बचाने कि सोचता है तथा घायल को कंधे पर उठाकर ले जाता है तो क्या वो घायल ब्राह्मण हरिजन से मना करेगा कि मुझे मत छू, पहले नहाकर आ?
आज भी देश के कई हिस्सों में रोज दलितों का अपमान होता है।
तो फिर कहां से इनका सामाजिक स्तर बढ गया है?
आज भी राजस्थान में कई जगह दलित दुल्हों को घोडी से उतार दिया जाता है।
क्या दलित हिन्दु नहीं है, क्या उन्हे घोडी पर बैठने का हक नहीं है ?
एसे ही कई कारण है जिस वजह से सरकार ने आरक्षण का प्रावधान कर इनका सामाजिक आर्थिक स्तर उठाने का कदम उठाया था।
अल्लाह बख्श, जालोर, 9 मई। तिलोडा के राजकीय विध्यालय में मेघवाल समाज के पांच बच्चे पढ रहै हैं, जिनको विधालय के अध्यापक और प्रधानाध्यापक प्रताडित करते हैं, तथा जातिसूचक गालियां देते हैं। जब बच्चों ने ये बाते घर पर बताई तो बच्चों के दादा अध्यापकों से मिले तो अध्यापकों ने उनके साथ भी गाली गलोज की।
दादा फिर कलेक्टर से मिले।
तथा अब जांच बैठा दी गई है।
पता नहीं क्या होगा इस जांच का?
इस देश के हर शहर गांव में कभी न कभी इस तरह की घटनाएं होती रहती है तो फिर कहां से आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो गया है।
लोग कहते हैं कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये जिससे कि वाकई में गरीबी दूर होगी(मेरा भी यही मानना है)।
लेकिन मैं ये कहता हूं कि ये कोन तय करेगा कि फलाना व्यक्ति गरीब है। जाहिर है कि ये कार्य सरकारी तंत्र द्वारा किया जाएगा तो क्या विश्वास किया जाए कि सरकारी लोग सही कार्य करेंगे।
पूरे देश में BPL सूचियां बनाई गयी लेकिन इसमें कई अमीरो ने भी अपने नाम जुडा लिये हैं।
सब ये जानते हैं कि फलानी जाती वाकई में निम्न जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। तो इसीलिये आरक्षण का आधार जातिगत रखा गया क्योंकि आज भी इस देश में कुछ लोगों को निम्न जाति का कह कर हैय द्ष्टी से दैखा जाता है।
आखिर में
मेरा मानना यह है आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है।