मेरा राजस्थान My Rajasthan

कान पर हाथ रख लो चाहे मैं तो चिल्लाता रहूँगा

Friday, April 28, 2006

वो रहस्यमयी कोन था ??? (My Journey)

कोटा से दिल्ली ट्रेन यात्रा तथा दिल्ली के बाद रोहतक और वहां पर शादी।
कसम से मजा आगया हरियाणा में भी शादी का, वैसे यहां उतने कार्यक्रम नहीं होते हैं जितने कि हमारे राजस्थान में होते हैं परन्तु हरियाणा की बात ही कुछ और है। रोहतक के पास एक गांव है कबूलपुर बस वहीं से रवाना होनी थी बारात।
अब बारात रवाना हूई तो समाचना पहूंची। यहां हम खूब नाचे। एक बात मैने नोट की वो ये थी कि यहां पर वर वधू के फेरों की रस्म दिन में ही हो जाती है जबकी राजस्थान में तो ये मध्यरात्री का कार्यक्रम है।
खेर शाम को मेरे एक मित्र संजीव ने कहा कि उसे शोच जाना है। वो भी कोटा से ही वहां पर गया था। मैने उससे कहा कि चल भई मैं भी फ्रेश हो लूंगा। अब गांव में तो शोच खुले आकाश के नीचे ही जाना पडता है। हम तीनो यानी की मैं, मुकेश तथा संजीव तीनों उचित स्थान की तलाश करने लगे।
हमने एक बुजुर्ग ग्रामीण से पुछा कि "कहां जाएं?"
तो उस बुजुर्ग ने हमें एक तालाब की तरफ का रास्ता बताया। ये जगह गांव से जरा बाहर थी। हमने कहा चलते है।
धूल का गुबार
मैने कहा "यार ये हवा में इतनी धूल क्यों हो रही है?"
हम चक्कर में पड गये कि ये इतनी धूल कैसे हो रही थी क्योंकि उस समय हवा एकदम शान्त थी। खेर हम इसी रास्ते पर आगे बडते गये। थोडा और चले तो देखा कि वहां पर गायों का रैला लगा हूआ था। कम से कम तीन चार हजार गायें थी वहां, और सारी धूल में मस्ती कर रहीं थी, अब मुझे हवा में इतनी धूल होने का कारण तो समझ में आगया था लेकिन इतनी सारी गायें एक साथ देखकर चकरा गया था। मैने जिन्दगी में इतनी गायें एक साथ नहीं देखी थी।
संजीव ने लाल रंग की शर्ट पहन रखी थी और अभी उजाला भी फैला हूआथा इसलिये मैने उससे शर्ट उतारने को कहा क्योंकि हो सकता है इन गायों में कोई सांड भी हो।
हम वहां से आगे बडे तो हमें एक मंदिर नजर आया। काफी विशाल मंदिर था। एक गांव वाला सामने से आरहा था मैने उससे पूछा कि ये किसका मंदिर है तो उसने बताया की हनुमान जी का है।
बदंरो का मेला
जिस तरह हमने गायें ही गायें देखी थी, अब हमें बंदर ही बंदर नजर आ रहै थे। असंख्य बंदर थे वहां, मुझे लग रहा थे कि जैसे मैं एलिस इन वंडरलेंड में हूँ। उन बंदरो से बचते हुए हम और आगे बडे तो मंदिर तक पहुंच गये। वहां पर एक विशाल तालाब था। लेकिन मैने सोचा कि हम यहां मदिंर के पास शोच नहीं कर सकते। मैने किसी से पुछा कि शोच के लिये कहां जाए? उस आदमी ने एक तरफ जाने को कहा उस तरफ वृक्षों कि बाड सी आ रही थी। उस आदमी ने बताया कि इन पेडों के बीच में एक पगडंडी जा रही है। तथा इस पगडंडी के जरीये इन पेडों की श्रंखला पार करने के बाद एक और तालाब आएगा, आप वहीं शोच कर लिजिएगा।
हमने जब इस वृक्ष श्रंखला को देखा तो लगता ही नहीं था कि इसके पार कोई तालाब होगा, ऐसा लगता था मानो मीलों लम्बा जंगल होगा।
संजीव का प्रेशर बढने लगा था। हमने पेडों में पगडंडी देखी और चल पडे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी गुफा में चल रहै हों। तभी हम क्या देखते हैं कि सामने से एक नाटा सा तथा मोटा सा आदमी मस्त चाल से हमारी दिशा में आ रहा था। वो आदमी करीब साडे तीन फीट का होगा और मोटाई में अमजद खान की तरह था। उसके पीछे बाडीगार्ड की तरह दो आदमी चल रहे थे। जैसे ही वे हमारे नजदीक आये हम जरा साईड में हट गये। वे हमें देखे बिना चले गये। उन्होने हम पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। मुझे ये बात बडी अटपटी सी लगी।
खैर हम जरा सा आगे बडे तो देखा कि सामने खुला मैदान था। वृक्षों की श्रंखला समाप्त हो गई थी। लम्बा चौडा मैदान और उस पर लगी हरी हरी घास अत्यंत सुंदर लग रही थी।
लेकिन एक बात थी।
वो बात ये थी कि वहां पर तालाब नहीं था। हमने चारों तरफ नजरें दोडाई लेकिन कोई तालाब नजर नही आया। पानी के नाम पर छोटे छोटे पोखर बने हुए थे। हमने फेसला किया कि इन पोखरों के पानी का ही इस्तेमान कर लेंगे।
हम तीनों ने अपनी अपनी पोजीशन संभाल ली।
उस वक्त मैने एक आदमी को देखा, यही वो रहस्यमयी आदमी था जिसका कि टाइटल में जिक्र हुआ है, मैने देखा कि उस आदमी ने एकदम सफेद रंग का कुर्ता पायजामा पहन रखा था। और वो आलथी पालथी मार कर बैठा हुआ था जहां वो बेठा हुआ था वहां पर कीचड था।
मैने अपने दोस्तों को उसे दिखाया, उन्होने भी उसे देखा। उस आदमी की पीठ हमारी तरफ थी, और वो एकदम योगमुद्रा में बेठा हूआ था। हमने फैसला किया कि निवृत होने के बाद उस आदमी के पास चलेंगे।
वह आदमी हम से करीब दो ढाई सौ फीट की दूरी पर बैठा था।
हम अपने कार्य से फारिंम हुए और पोखर के पानी से काम चलाया।
तभी मैने एक और चीज पर गौर किया, मैने संजीव से कहा "यार! तुझे नहीं लगता कि इस आदमी के हाथ आवश्यकता से अधिक लम्बे हैं।"3
तो उसने मजाक में हंसते हुए जवाब दिया "हां हमें पास जाकर देखना चाहिये कि कहीं उसके पैर भी तो उल्टे नहीं है"
इस बात पर हम सभी ने जोर से ठहाका लगाया।
फिर हम उस व्यक्ति कि लम्बाई का अनुमान लगाने लगे तो हमें लगा कि इस बात पर हमारा ध्यान पहले क्यो नहीं गया।
वो आदमी हमसे दूर जरूर था लेकिन यकीनन बैठे हुए में उसकी लम्बाई 6 फीट लग रही थी, हमने सोचा कि ये खडा होगा तो कितना लम्बा होगा।
हम लोग चिल्ला चिल्ला कर बातें कर रहै थे लेकिन कमाल की बात थी कि वो आदमी टस से मस नहीं हो रहा था। हम उसके काफी करीब जा चुके थे और उस आदमी ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा था।
फिर न जाने हमें एकदम से क्या हुआ हम वापस जाने की बातें करने लगे एकदम उस आदमी के पीछे खडे होकर, और हमने वापस आने का रास्ता पकड लिया क्योंकि अंधेरा सा होने लगा था।
और हम धीरे धिरे वहां आगये जहां बारात ठहराई गई थी।
जब ये बात हमने वहां के रहने वाले लोगों को बताई तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया, सब कह रहे थे कि उस तरफ वैसे तो कोई जाता नहीं और अगर चला भी गया तो कोई आलथी पालथी मारकर नहीं बेठेगा। और हां उसकी लम्बाई के और हाथों की लम्बाई के बारें में भी किसी ने विश्वास नहीं किया।
और जिसने विश्वास किया उसने यही कहा कि आपकी किस्मत अच्छी थी जो आप वहां से बच कर आगये।

Thursday, April 27, 2006

मेरी यात्रा (ऐसा देश हे मेरा)

बहुत दिनों बाद लिख रहा हूं थोडी गलती हो सकती है।
मेरे करीबी मित्र कि शादी में शामिल होने कि लिये मैं 15 अप्रेल को कोटा से दिल्ली चला। दिल्ली इसलिये क्योंकि रोहतक जाने के लिये दिल्ली का चक्कर लग जाता है।
ट्रेन थी जनशताब्दी एक्सप्रेस।
काफी सुना था इसके बारे में, आज मैं इसमें सफर करने जा रहा था। कम किराया, तीव्र गती तथा अच्छी सुविधाएं। तडके स्टेशन पहूंच गया। मेरे साथ मेरा मित्र मुकेश मालव भी था।
सुबह के 6:30 बजे गाडी रवाना हुई।
बार बार वेटर आने लगे। कोई पानी बेच रहा था कोई नाश्ते में कटलेट कोई चाय काफी। थोडी देर बाद टीटी साब ने डब्बे में प्रवेश किया। सबके टिकिट चेक करने लगे। ये साधारण सी बात मैं इसलिये लिख रहा हूं क्योंकि एक कहानी टीटी साब के कारण ही बनी।
हमारी भी टिकिट कि जांच हूई। टीटीसाब आगे चले। ओर उन्होने सारे डब्बे कि जांच करली। फिर एक स्टेशन आया फिर दुसरा स्टेशन आया। मेरे जैसे लोग जो बहुत कम सफर करते हैं( हालांकि मुझे घूमना अत्यधिक पसंद हे) एसे समय में अपने अपने मोबाइल में टावर या सिग्नल खोजते रहते हैं।
भरतपुर के बाद डब्बे में एक ओर टीटी साब चढे, वो भी टिकिट चेक करने लगे, मुझे टीटी कि शक्ल देखकर उब आरही थी। मैने अपनी आंखे बन्द करली और सोने कि कोशिश करने लगा। तभी मुझे कुछ शोर शराबे कि आवाज आई। आंखें खोलकर देखा तो पाया कि टीटी साब एक महिला से झगड रहे थे जो मेरे पीछे वाली सीट पर बैठी थी।
कुछ देर तक झगडे पर ध्यान देने पर पता चला कि उस महिला ने अपने 6 साल के बच्चे का टिकिट नही लिया था तथा इसका कारण वह अनभिज्ञता बता रही थी।
महिला बोली "इसे तो मैं शुरु से ही गोद में बैठा कर ला रही हूं ओर फिर यह सिर्फ 6 साल का ही तो है"
टीटी साब फरमाए "तीन साल से बडे का टिकिट लगता है, मालूम नहीं था क्या?"
महिला बोली "जी मुझे वाकई मालूम नहीं था। और फिर मैं इसे गोद मैं भी तो बैठा कर ला रहीं हूं"
टीटी बोले "अच्छा! खूब जानता हूं तेरे जैसे औरतों को, बच्चे का छोटे होने का बहाना करके इसे फोकट में ले जाती है, 20 साल की नौकरी हे मेरी, एक काम कर इस बच्चे को क्या इन बडे बडे लोडों को बैठा ले अपनी गोद में ओर लेजा फोकट में। चल चुपचाप से जुर्माने को 334 रूपये निकाल वरना अगले स्टेशन पर ही थाने में करवाउंगा तुझे।"
मैं उस टीटी कि वाणी सुन कर हक्का बक्का रह गया। एक सभ्रांत महिला से अत्यधिक बदतमीजी से बात कर रहा था वो। मेरा मन किया कि खडा होकर एक तमाचा जड दूं टीटी के गाल पे।
पुलिस की धमकी सुनते ही महिला गिडगिडाने लगी ओर अपने पर्स में रुपयों कि खोजबीन करने लगी। उसने 50 का नोट निकाला और बोली कि साब मेरे पास तो सिर्फ ये ही हैं इस वक्त।
टीटी उसे धमकी देकर आगे चला गया।
मैने सोचा कि टीटी भला बुरा कहकर शांत होगया। और एक मोका देकर चला गया होगा मगर मेरा सोचना गलत था टीटी साब ने दुबारा प्रवेश किया और इस बार उनके साथ एक पुलिस वाला भी था।
"यही है वो अगले स्टेशन पर उतार लेना इसे" टीटी पुलिस वाले से बोला
मुझे लगा कि अब इस महिला कि दुर्गति होने वाली है।
वो एक ठीक ठाक पढी लिखी औरत थी।
मुझे लगा कि अब अगर मैं नहीं बोला तो धिक्कार हे मुझपे।
और मैं बीच में कूद पडा
मैने टीटी से कहा "टीटी साब गलती होगई इनसे आप कृपया इन्हे माफ करदें। एक बार तो सभी माफ करते हैं।"
टीटी बोला "20 साल की नौकरी है मेरी और आप जैसे हजारों देखें है। कानून तो कानून है।"
मैनें कहा "एक बार माफ कर दीजिय़े, आपके कानून का क्या बिगड जाएगा?"
मेरे बोलने की देर थी कि डिब्बे में कई लोग एक साथ मेरे सुर में सुर मिलाने लगे, सारे के सारे भरे बैठे थे और किसी के बोलने का इन्तजार कर रहै थे।
कोई बोला "क्या कानून की बाते करते हो? तुम भी तो रुपये खाकर लोगो को रिजर्वेशन में बेठाते हो।"
टीटी गुस्से में आगया, उसने जलती हुई आंखों से मेरी तरफ देखा। मेरे मन में ख्याल आया कि कहीं मैनें चलता सेंटर में तो नहीं ले लिया(फटे में टांग अडाना) है।
टीटी भुनभनाने लगा। मैने उसकी नाराजगी दूर करने के लिया उससे कहा "भाईसाब माफ करदो बेचारी को, आप तो बडे हो। इस बार छोड दो इसे।"
सब लोग टीटी को गुस्से में देख रहे थे।
अन्त में मैने कहा "टीटी साब आप कोटा ही रहते हो ना!"
"हां"
"बस तो फिर क्या है वहां मिल लुंगा मैं आपसे, ओर चुका दुंगा इसका जुर्माना"
टीटी साब को फिर पता नहीं क्या हुआ। उन्होने गुस्से में मुझे देखा, और डिब्बे से प्रस्थान कर गये।
मैने महिला की तरफ देखा। वो बडी कृतज्ञता से मेरी तरफ देख रही थी। मैने तो सिर्फ इतना कहा।
"अगली बार ध्यान रखना, बच्चे का टिकिट जरूर लेना"
 
 

Thursday, April 20, 2006

लो मैं आ गया

मित्र की शादी से आने के बाद काफी अच्छा महसूस कर रहा हूँ। मगर कुछ भी हो मजा आ गया। मेरे जाने से लेकर आने तक ऐसे ऐसे वाकये( घटनाएं) हुई कि मेरा सफर अत्यंत मनोरंजक बन गया।
मेरे सफर की कहानी हंसी मजाक, रहस्य रोमांच से भरपूर है। कहानी काफी लम्बी है इसलिये मैं इसे अगली बार सुनाउंगा।

Friday, April 14, 2006

मित्र की शादी में जा रहा हूँ

अब तो यारों चार दिन बाद मुलाकात होगी। ब्लागिंग से जुडने के बाद पहली बार इतने दिन इससे दूर रहूंगा।

Thursday, April 13, 2006

सलमान खान छूट गया

आज जब सलमान छूटा तो ऐसे अकडकर निकला कि विश्वविजय कर ली हो। बाकी सारे कलाकार जो उसे लेने गये थे(जो दाउद की पार्टी में ठुमके लगाते थे) वे भी अत्यंत प्रसन्न नजर आ रहे थे। जेल के बाहर सलमान के प्रशंषक नारे लगा रहे थे कि अभी तो ली अंगडाई है, आगे और लडाई है
पर क्या ये आजादी परमानेंट(स्थाई) है?
जरा सोचो सलमान क्या पता जिस दरवाजे से तुम अकडकर निकल रहे हो वहां फिर से तुम्हारे स्वागत की तैयारीयां हो रही हो?
 

Wednesday, April 12, 2006

ब्लाग लिखने वाले को दस साल की सजा

घबराइये नहीं भारत में नहीं चीन में।
जी हां यह सत्य है, चीन में शानदोंग प्रान्त में एक शिक्षक को लोकतंत्र के विषय में लेख प्रकाशित करने के आरोप में दस साल की सजा सुनाई गई है। उसका जुर्म यह है कि उसने अपने लेख में सरकार विरोधी विचार व्यक्त किये। चुंकि इस घटना का ताल्लुक सुचना के प्रसार की एक व्यवस्था इंटरनेट से है,  जिसे आजाद अभिव्यक्ति का सबसे प्रमुख औजार माना जाता है और जिसे अनुशाषित करने कि प्राय: कोई कोशिश नहीं होती,  इसलिये मैं इससे बडा चकित हूँ।
चीन में एक पत्रकार भी ऐसे ही जुर्म में जेल कि हवा खा रहा है। हाल ही में चीन में इंटरनेट को नियंत्रित करने की जितनी भी कोशिशे कि गई है उन सबसे मेरे मन में सवाल उभर रहै हैं। कई इंटरनेट कंपनियां अपने व्यापार के मद्देनजर चीन सरकार के आगे घुटने टेक रहीं है।
हालांकी इंटरनेट पर पचास फीसदी सामग्री अश्लीलता संबंधी है और आतंकवादी गतिविधियों में भी 11 सितंबर के बाद इंटरनेट का इस्तेमाल बडा है। लेकिन इससे किसी को भी इनकार नहीं होगा कि सूचना तकनीक के विश्वव्यापी प्रवाह में जो भुमिका इंटरनेट निभा रहा है, शायद ही कोई दुसरा औजार या तकनीक कर सके। अगर इंटरनेट को सीमित दायरे में कैद किया जाए तो सुचना साम्राज्य अपना वास्तविक औचित्य ही खो देगा, क्योंकि सूचना निरंकुश सत्ताओं की मनमानी की शिकार होने के स्थान पर बंधनो से मुक्त होकर स्वस्थ समाज के निर्माण में सहयोग देती है।
गूगल को भी चीन में सेल्फ सेंसर्ड वेबसाईट खोलनी पडी है। चीन में सरकारी स्तर पर खुलापन और उदार रवैया संभव नहीं है, जैसा कि भारत में विदेशी कंपनीयों को हासिल है। यहां तो गूगल अर्थ डाट कोम पर राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास और महत्वपूर्ण ठिकाने देखे जा सकते है। पर चीन में ऐसा नहीं है वहां इंटरनेट पुलिस है जो विदेशी वेबसाइटों पर निगरानी रखती है।
इस संभावित प्रतिबंध और बाजार के खोने के डर ने ही गूगल को चीन के लिये अलग से नई वेबसाइट(गूगल डॉट सीएन) बनाने पर मजबूर कर दिया, जिस पर चीनी भाषा में कुछ चुनिंदा सामग्री तथा बेहद सीमित वेब एक्सेस मिल पाएगा।
शायद गूगल का मानना है कि चीनी समाज और बाजार से हमेशा के लिये बाहर हो जाने से अच्छा विकल्प यही है।

--
युगल मेहरा

Monday, April 10, 2006

श्रीगंगानगर में महिला 'डॉन'

दैनिक भास्कर के अनुसार श्रीगंगानगर में तीन महिला 'डॉन' है। इन महिलाओं ने अपराध जगत में सनसनी फैला रखी है। इन पर करीब 55-56 अपराधिक मामले दर्ज हैं।(दैनिक भास्कर)

इनमें सबसे खतरनाक महिला 'डॉन'है 57 वर्षीय भागो देवी। इसने हत्या, चोरी, मारपीट के 32 मामले दर्ज हैं। इसे 1994 में पुलिस ने हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया था तथा 2000 में रासुका अर्थात राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार भी कर चुकी है। इसके दो पुत्र भी हिस्ट्रीशीटर हैं।शहर के अन्य पुरुष 'डॉन' भागो देवी के सामने फटकते भी नहीं है।

दुसरी लच्छो है

तीसरी है निर्मला मेडम।

ऐसा लगता है कि जैसे मैं किसी फिल्म की कहानी लिख रहा हो।

आपको कैसा लगा पढकर?

Saturday, April 08, 2006

निरंतर ब्लागजीन के बारे में

ये जो निरंतर ब्लागजीन है यह अब बंद हो गई है क्या?
अगस्त 2005 के बाद कोई अंक ही नहीं आया इसका।
क्या कारण हो सकता है इसका?
हम इसलिये पूछ रहै हैं भाई क्योंकि ये हमें अच्छी लगी है।
जल्दी शुरू करो भाई।

Wednesday, April 05, 2006

उम्र कैसे साबित करुं

यार कोई बन्दा आपसे कहे की आप बुडउ हैं जब कि आप 26साल के नोजवान बन्दे है, तो मैं क्या करुं। बताओ यारों। आप चाहै तो मेरे फोटो देख सकते हैं यहां पर

Tuesday, April 04, 2006

धर्म की परिभाषा देनी ही पडेगी

धर्म जीवन एक विधी है जो व्यक्ति को उसके वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराती है। धर्म का शाब्दिक अर्थ है धारण करना। अर्थात जो तत्व सम्पूर्ण संसार के जीवन को धारण करता हो, जिसके बिना संसार में व्यक्ति की स्थिती संभव न हो वही धर्म है।
यानी कि जिन सिद्धान्तों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बंधों की स्थापना होती है, वही धर्म है।
जो बुद्धिजीवी यह कर धर्म को नकारते हैं कि हमने इतने ग्रंथ पढ लिये है और धर्म बैकार की बकवास है। जो यह कहते हैं की बिना धर्म के भी वे जीवन यापन कर सकते हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि धर्म एक तत्व है वह हिन्दु, मुस्लिम, सिख और ईसाई नहीं है। धर्म जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करने की विधी है। धर्मानुसार हमें विभिन्न कार्य करने पडते हैं।
धर्म को आप नकार नहीं सकते क्योंकि धर्म वह है जो व्यक्ति के चरित्र और नैतिक भावनाओं को उत्तम करता है तथा व्यक्ति में कर्तव्य की भावना का विकास करता है।
धर्म को विस्तृत रूप में देखें। धर्म का रूप अत्यधिक विस्तृत है, यदि मैने पूरा यहां समझाने की कोशिश की तो यह एक क्लासरूम लगेगा। धर्म कर्तव्य है, आप कितने ही तथ्यों पर विश्वास करने वाले क्यों न हो कितने ही विज्ञान पर आधारित बाते समझने वाले क्यों न हो, परंतु आपको धर्मानुसार चलना ही पडता है।
इतनी धार्मिक बातें धर्म से सीखने के बाद आप धर्म से विरक्त चाह कर भी नहीं हो पाएगें।
1. क्या आप पितृ धर्म का पालन नहीं करेंगे?
2. क्या आप मातृ धर्म का पालन नहीं करेंगे?
3. क्या आप पुत्र धर्म नहीं निभाएंगे?
4. क्या आप पराई स्त्री पर नजर डालेंगे? (धर्म ने ही सिखाया है कि पराई नारी पर नजर न डालें)
5. क्या आप गुरुजनों का सम्मान नहीं करेंगे?
यही सब तो धर्म है।
बहुत कुछ और भी बाकी है,
लेकिन में सार में कहना चाहता हूँ कि जो तत्व कल्याण में सहायक हो, जिसके द्वारा मनुष्य सदैव अभय रहे, अधीनता और आत्म-शान्ति का अनुभव करे, जिसमें वास्तविक संतोष, वैभव और यश प्राप्त हो, उसी को धर्म कहा जाता है।

Saturday, April 01, 2006

मैं क्षमा चाहता हूँ

जी हां मैं क्षमा चाहता हूँ उन सभी महानुभावों से जो मेरे विचारों द्वारा व्यथीत हो जाते हैं।
मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो जरा आधुनिक हैं जिन्हें होली का त्यौहार नहीं सुहाता कि इस त्यौहार मैं भौंडापन है। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जिन्हे वेलेन्टाईन डे नहीं मनाने दिया जाता। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जिन्हे मैं गुस्से में तु तडाक कर जाता हूँ। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो धर्म का पक्ष लेने पर मुझे हिन्दुवादी कहते है। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो अपने धर्म की बुराई करके इठलाते हैं। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो आधुनिक विचार धारा के कहलाते हैं। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो दिखावे में जिंदगी बिताते है। मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जो यह जताते हैं कि वे धर्मनिरपेक्ष हैं।

मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जिनके लिये धर्म एक बकवास है।
मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे जिन्हे मनुष्य बनने कि आस है।।
जो मुझे मानवता पर गन्दा धब्बा बताते हैं।
अपने जिस्म के दाग शान से बताते हैं।।
हां मेरी बुद्धि अल्प है और संकीर्ण मानसिकता है।
लेकिन फिर भी धार्मिक होना अच्छा लगता है।।
जो रामायण, महाभारत, गीता, विष्णु पुराण और शिव पुराण भी पढते हैं।
जो मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और गिरजाघर की सिढीयां भी चडते हैं।।
और बाद में इन ग्रंथों को बुरा बताते हैं।
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और गिरजाघर जाने को पर्यटन बताते है।
जो पाखडिंयो के कृत्य से पुरे धर्म को गाली बकते है।
एसे ही लोगो को आधुनिक जगत में महान कहते है।
गोतम हिंदु थे जब बोधिसत्व प्राप्त हुआ था।
तब एक नये धर्म का आगाज हुआ था।।
बोद्ध धर्म को उन्होने एक उंचाई दी।
कोई बता दे कि उन्होने हिन्दु धर्म की बुराई की।।
प्रत्येक धर्म महान है क्योकि वह मानवता, मनुष्य का कल्याण सिखाता है।
परंतु इससे भी महान वे लोग हैं जिन्हे हर धर्म एक बकवास नजर आता है।।
मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे मैं क्षमा चाहता हूँ उनसे।।।

Nocs FROM yugal mehra

 

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