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कान पर हाथ रख लो चाहे मैं तो चिल्लाता रहूँगा

Thursday, May 18, 2006

ऐसा भी होता है

कभी कभी एसा होता है कि मन करता है कि चिठ्ठे पर कुछ लिखा जाए और कुछ सूझता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं सबके साथ होता होगा। हम सभी के साथ कभी न कभी ऐसा वक्त आता है जब हम लिखना चाहते हैं और यह तक नहीं सोच पाते कि विषय क्या होना चाहिये। और जब विषय ही नहीं हो तो लिखें क्या खाक। विषय ढूढंने के लिये समाचार पत्र देखतें हैं या टीवी। फिर भी विषय तलाशने में असफल होते हैं। ऐसे में क्या करे चिठ्ठाकार।
क्या लिखे वो?
आज मेरे साथ यही समस्या हुई। लिखने की इच्छा हुई और विषय नहीं ढूंढ पाया कि किस पर लिखा जाए।
तब मुझे एक आईडीया आया।
मैने सोचा कि जब कुछ नहीं आरहा तो क्यो न दुसरों के चिठ्ठे पढूं।
और जब चिठ्ठे पढे तो सोचा कि क्यों न इसी विषय पर लिख दुं कि विषय नहीं मिल रहा है।
और ठोक दी यह पोस्ट।
अब किसी को इसे पढकर मजा आये न आये, मुझे तो लिखने में बहूत मजा आया।
झेलो भई झेलो
हा हा हा

1 Comments:

Blogger Udan Tashtari said...

झेल लिया।

समीर लाल

Friday, May 19, 2006 10:33:00 PM  

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