मै फिर आगया हूँ
काफी दिनो बाद नेट पर बैठने का मौका मिला,
नारद याद आगया।काफी कुछ बदल गया है।
अब मैं नियमित आया करुंगा।
युगल मेहरा
कान पर हाथ रख लो चाहे मैं तो चिल्लाता रहूँगा
काफी दिनो बाद नेट पर बैठने का मौका मिला,
मेरे महान देश की सरकार ने फिर से पेट्रोल डीजल के दाम बढा दिये। पूरे चार रूपये।
आत्मा अजर अमर होती है। शरीर नाशवान है वह मरता है परन्तु आत्मा कभी नहीं मरती है। यही हमें बचपन से ही सिखाया जाता है।
आत्माएं शरीर बदलती रहती है। आत्माओं के लिये शरीर मात्र एक किराए के मकान की तरह होता है। जब वे इसे छोडती हैं तो शरीर
को मृत मान लिया जाता है।
इसका मतलब हम आत्माए हैं जो इस शरीर में रह रहै है। किसी दिन हम इस शरीर को छोड देंगे।
लेकिन जब सभी जानते हैं कि आत्माएं नहीं मरती तो फिर किसी के मरने पर इतना रोना धोना क्यों होता है।
दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है?
यह बात भी आश्यर्य की है कि दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है जबकी आत्मा तो अजर अमर है। आत्माएं शरीर बदलती है इससे
मानव का जीवन मृत्यु का खेल चलता है, तो इस नियम के अनुसार तो जनसंख्या नहीं बढनी चाहीये न। क्योंकी जो मर रहा है वो
कुछ दिनों बाद फिर जन्म ले रहा है, तो फिर इतनी पापूलेशन कैसे बढी।
हम भारतीय 35 करोड से एक अरब कैसे होगये?
क्या नई नई आत्माएं जन्म ले रही है?
उदाहरण के तोर पर भारत देश में 1940 के समय लगभग 35करोड की जनसंख्या थी। इसका मतलब 35करोड आत्माएं 35करोड
शरीरों में रह रही थी। तो फिर ये जनसंख्या उत्तरोत्तर आगे कैसे बडती गई। तो क्या लगातार आत्माएं भी जन्म ले रही थी?
ये बात मेरी समझ से परे है
क्या आत्माएं भी आपस में शादी करके बच्चे पैदा कर रही है?
तभी तो एक अरब आत्माएं हो गई है।
इसका मतलब सरकार को आबादी नियंत्रण के ये जनता को समझाने कि बजाय आत्माएं को समझाना चाहिये कि वो आत्माएं पैदा न
करें। बैचारे शरीर फालतु ही बदनाम हो रहै हैं जनसंख्या वृद्धी के लिये।
कभी कभी एसा होता है कि मन करता है कि चिठ्ठे पर कुछ लिखा जाए और कुछ सूझता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं सबके साथ होता होगा। हम सभी के साथ कभी न कभी ऐसा वक्त आता है जब हम लिखना चाहते हैं और यह तक नहीं सोच पाते कि विषय क्या होना चाहिये। और जब विषय ही नहीं हो तो लिखें क्या खाक। विषय ढूढंने के लिये समाचार पत्र देखतें हैं या टीवी। फिर भी विषय तलाशने में असफल होते हैं। ऐसे में क्या करे चिठ्ठाकार।
चलो आप यह बात तो स्वीकार करते हैं कि दलितों का सामाजिक स्तर ऊंचा नहीं हुआ है।
अब मैं आपके प्रश्नों के जवाब देता हूँ।
मेरी पिछली पोस्ट में मेरे चिठ्ठाकार भाईयों ने कमेंट्स किये।
उनमें से आशीष जी ने कुछ प्रश्न किये, कुछ प्रतीक ने छाया भाई ने आरक्षण का विरोध किया तथा सृजन शिल्पी ने समर्थन किया। अब मैं आरक्षण विरोधियों के तर्कों के उत्तर देने के प्रयास करूंगा।
"""१.माना दलितो को आरक्षण नौकरी के लिये चाहिये, अब उन्हे पदोन्नति के लिये आरक्षण क्यों चाहिये ?"""
आशीष जी आरक्षण दलितों का सामाजिक स्तर सुधारने के लिये किया गया प्रयास है। पदोन्नति के लिये आरक्षण भी इसी कार्य का एक हिस्सा है। जिससे कि उंचे पदों पर भी पिछडी जातियों के लोग आयें ओर उनका प्रतिनिधित्व करे।
"""२.दलितो को शिक्षा के लिये आरक्षण दे दिया, पढ लिख गये, अब उच्च शिक्षा के लिये आरक्षण क्यो चाहिये ?"""
आरक्षण का प्रमुख उद्देश्य दलितों को शिक्षित करना है अब इसमें आप ये कहैं कि दलित को तो सिर्फ साक्षर करदो, तो फिर बाकी पढाई की भी क्या जरुरत है। दलित अपने स्तर पर किये प्रयासों द्वारा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता है क्योंकि अकसर दलित गरीब होता है।
"""३.पिता ने आरक्षण के द्वारा नौकरी पा ली, अब बच्चे को आरक्षण क्यों चाहिये ?
इसका जवाब बहुत आसान है। - पूत्र जिन्दगी भर पिता पर बोझ नहीं बन सकता, उसको भी घर को चलाना ही पडेगा। पिता के जमाने के कॉम्पीटीशन में ओर अभी के में कितना अन्तर है ये सभी जानते हैं। प्रतियोगिताओं में आरक्षित वर्गों कि मेरिट उंची होना प्रमाण है कि कॉम्पीटीशन बढ गया है। इसलिये बच्चे को आरक्षण की आवश्यकता है। हमारे देश में पिता का राशन कार्ड में नाम होने के बावजूद पुत्र व्यस्क होने पर अपना राशन कार्ड अलग बनाता है क्योंकि उसका संघर्ष उसका अपना होता है।
"""५.आप अपने आसपास मे आरक्षण द्वारा लाभित ऐसे व्यक्ति का नाम बता दिजिये जिसने अपनी जाति के उद्धार के लिये काम लिया हो ?
ऐसे हजारों लाखों लोग है जो अपनी जाति के उद्धार के लिये प्रयासरत हैं। जिनके नाम कोई नहीं जानता जिनके प्रयास कोई नहीं जान पा रहा।
कितने ही ऐसे भारतीय हैं जिन्होने स्वतंत्रता के आंदोलन में सक्रीय भुमिका निभाई पर क्या हम सबके नाम जानते हैं। हां पर मैं अवश्य ऐसे कई व्यक्तियों और संस्थाओं को जानता हूं जो अपनी जाति के उद्धार के लिये कार्य कर रहैं है।
"""६.किसी भी छात्रावास मे जाइये और किसी से भी पूछिये कि सरकार द्वारा दी जाने वाली स्कालरशीप के पैसो का ये छात्र क्या उपयोग करते है ?
मेरा आधा जीवन छात्रावास में गुजर गया। मैं जानता हूं कि किस प्रकार छात्र अपनी स्कालरशिप का उपयोग करता है। कुछ लोगो के गलत उपयोग को देखकर सभी को गाली नहीं दी जा सकती। लडके अपनी किताबें ओर साल भर के एक जोडी कपडे स्कालरशिप से खरीदते हैं। दलितों की स्थिती देखने के लिये उनमे रहना आवश्यक है।
"""७. आपके अनुसार मौजुदा आरक्षण व्यवस्था ने ५७ साल मे कुछ नही किया (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है), लेकिन क्यो ? क्या यह वर्तमान व्यवस्था की असफलता नही है ?
ये आपने सबसे अहम सबाल किया आशीष जी तथा ये प्रश्न मैने कई लोगों के मुह से सुना और पढा है।
इसके जवाब में मैं यह कहना चाहता हूं कि इतने सालों में आरक्षण व्यवस्था कुछ तो किया है। हां ज्यादा असर नहीं हुआ तथा (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है) लेकिन यह व्यवस्था कि असफलता नहीं है। व्यवस्था अपना कार्य कर रहीं है परन्तु इसकी गती धीमी है।
यदी कोई दवा किसी रोग को अत्यंत धीमे ठीक कर रही है और उसका असर नजर नहीं आरहा तो दवा बन्द नहीं की जाती बल्की उसकी मात्रा में ईजाफा कर दिया जाता है, रोगी को मरने के लिये नहीं छोड दिया जाता। एक और उदाहरण लो हमारा कोई कार्य सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही के कारण यदी धीमी गती से होता है या फिर होता ही नहीं है तो क्या हम प्रयास बन्द कर देते हैं। नहीं ना। तो फिर आरक्षण भी धीरे धीरे असर कर रहा है।