मेरा राजस्थान My Rajasthan

कान पर हाथ रख लो चाहे मैं तो चिल्लाता रहूँगा

Monday, July 09, 2007

मै फिर आगया हूँ

काफी दिनो बाद नेट पर बैठने का मौका मिला,
नारद याद आगया।काफी कुछ बदल गया है।
अब मैं नियमित आया करुंगा।
युगल मेहरा

Tuesday, June 06, 2006

इसे खून पीना कहते है

मेरे महान देश की सरकार ने फिर से पेट्रोल डीजल के दाम बढा दिये। पूरे चार रूपये।
जिसने भी सुना भोचक्का रह गया।
मेरे एक मित्र का मानना है कि सरकार सडकों पर वाहनो का दबाव कम करने का प्रयास कर रही है।
सरकार का राग हमेशा की तरह वही पुराना है कि कच्चे तेल के दाम बढ रहै हैं। इसलिये सरकार घाटा नहीं खा सकती है और दाम बडाना मजबूरी बताती है। और फिर मेरे देश की तेल कम्पनीयां भी तो कह रही है की वे घाटे में चल रही है।
सच्चाई कोई नहीं जानता
आखिर क्या है सच्चाई, जब दुसरे मुल्कों में पेट्रोल के दाम कम है तो हमारे देश में उच्चतम स्तर पर क्यों?
इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है कि हमारे देश की सरकारें संवेदनहीन है। दाम बढाने का जनता पर क्या असर पडता है इससे सरकार को कोई लेना देना नहीं है। लेकिन एक बात सोचने लायक है कि सरकारें जनता कमर क्यों तोड रही है?
सारा देश जानता है कि पेट्रोल डीजल के दाम बडने से कहां क्या असर होता है और कहां कितनी महंगाई बड जाती है?
आखिर सरकार की संवेदनहीनता का क्या कारण है जबकी इन लोगों को वोट मांगने हमारे बीच में ही आना पडता है?
जब भी दाम बढाए जाते हैं उसका कारण कच्चे तेल की कीमत में वृद्धी तथा सरकार को हो रहा घाटे को बता दिया जाता है, मैं ये जानना चाहता हूं कि आखिर सरकार को घाटा किस जगह पर हो रहा है। जिस मुल्य में तेल सरकार को पडता है उसी मुल्य में हमें तो नहीं बेचा जाता है बल्की बढाकर बेचा जाता है फिर सरकार को घाटा लगने का तो कोई सवाल ही नहीं खडा होता है।
सारा खेल रेवेन्यु का है
आखिर सारा खेल रेवेन्यु का है। एक लीटर पेट्रोल पर सरकार कर लगाकर द्वारा 17 से 19 रूपये तक बचाती है। जब ईंधन की कीमते एफोर्ड करना देश की जनता की जैब के दायरे से बाहर होता जा रहा है तो क्या सरकार  का इस वस्तु से रेवेन्यु कमाना कहां तक वाजिब है? कुछ कर केन्द्र सरकार लगाती है कुछ कर राज्य सरकार लगाती है।
आखिर ईंधन को रेवेन्यु के दायरे से बाहर क्यों नहीं कर दिया जाता?
मंत्री जी का क्या जाता है।
वे तो सरकारी खर्च के ईंधन पर यात्राएं करते हैं।
कम्पनीयों का झूठ
देश की कम्पनीयां हमेशा अपने आप को घाटे में बताती रहती है, मेरे समझ में ये नहीं आता की अगर ये कम्पनीयां इतनी घाटे में रहती है तो फिर डीलर को डिस्काउंट कहां से देती है?
क्या पेट्रोल कर दायरे से मुक्त हो पाएगा? शायद कभी नहीं।
सरकारों को ऐसे ही निरीह जनता का लहू पीना है और पीती रहैंगी। चाहै कोई सी भी सरकार आए खुं पीना बदस्तुर जारी रहैगा।

Saturday, June 03, 2006

क्या आत्मा अजर अमर है?

आत्मा अजर अमर होती है। शरीर नाशवान है वह मरता है परन्तु आत्मा कभी नहीं मरती है। यही हमें बचपन से ही सिखाया जाता है।
आत्माएं शरीर बदलती रहती है। आत्माओं के लिये शरीर मात्र एक किराए के मकान की तरह होता है। जब वे इसे छोडती हैं तो शरीर

को मृत मान लिया जाता है।
इसका मतलब हम आत्माए हैं जो इस शरीर में रह रहै है। किसी दिन हम इस शरीर को छोड देंगे।
लेकिन जब सभी जानते हैं कि आत्माएं नहीं मरती तो फिर किसी के मरने पर इतना रोना धोना क्यों होता है।
दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है?
यह बात भी आश्यर्य की है कि दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है जबकी आत्मा तो अजर अमर है। आत्माएं शरीर बदलती है इससे

मानव का जीवन मृत्यु का खेल चलता है, तो इस नियम के अनुसार तो जनसंख्या नहीं बढनी चाहीये न। क्योंकी जो मर रहा है वो

कुछ दिनों बाद फिर जन्म ले रहा है, तो फिर इतनी पापूलेशन कैसे बढी।
हम भारतीय 35 करोड से एक अरब कैसे होगये?
क्या नई नई आत्माएं जन्म ले रही है?
उदाहरण के तोर पर भारत देश में 1940 के समय लगभग 35करोड की जनसंख्या थी। इसका मतलब 35करोड आत्माएं 35करोड

शरीरों में रह रही थी। तो फिर ये जनसंख्या उत्तरोत्तर आगे कैसे बडती गई। तो क्या लगातार आत्माएं भी जन्म ले रही थी?
ये बात मेरी समझ से परे है
क्या आत्माएं भी आपस में शादी करके बच्चे पैदा कर रही है?
तभी तो एक अरब आत्माएं हो गई है।
इसका मतलब सरकार को आबादी नियंत्रण के ये जनता को समझाने कि बजाय आत्माएं को समझाना चाहिये कि वो आत्माएं पैदा न

करें। बैचारे शरीर फालतु ही बदनाम हो रहै हैं जनसंख्या वृद्धी के लिये।

Thursday, May 18, 2006

ऐसा भी होता है

कभी कभी एसा होता है कि मन करता है कि चिठ्ठे पर कुछ लिखा जाए और कुछ सूझता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं सबके साथ होता होगा। हम सभी के साथ कभी न कभी ऐसा वक्त आता है जब हम लिखना चाहते हैं और यह तक नहीं सोच पाते कि विषय क्या होना चाहिये। और जब विषय ही नहीं हो तो लिखें क्या खाक। विषय ढूढंने के लिये समाचार पत्र देखतें हैं या टीवी। फिर भी विषय तलाशने में असफल होते हैं। ऐसे में क्या करे चिठ्ठाकार।
क्या लिखे वो?
आज मेरे साथ यही समस्या हुई। लिखने की इच्छा हुई और विषय नहीं ढूंढ पाया कि किस पर लिखा जाए।
तब मुझे एक आईडीया आया।
मैने सोचा कि जब कुछ नहीं आरहा तो क्यो न दुसरों के चिठ्ठे पढूं।
और जब चिठ्ठे पढे तो सोचा कि क्यों न इसी विषय पर लिख दुं कि विषय नहीं मिल रहा है।
और ठोक दी यह पोस्ट।
अब किसी को इसे पढकर मजा आये न आये, मुझे तो लिखने में बहूत मजा आया।
झेलो भई झेलो
हा हा हा

Tuesday, May 16, 2006

आरक्षण किसी का हक नहीं है

चलो आप यह बात तो स्वीकार करते हैं कि दलितों का सामाजिक स्तर ऊंचा नहीं हुआ है।
अब मैं आपके प्रश्नों के जवाब देता हूँ।
मेरी पिछली पोस्ट में मेरे चिठ्ठाकार भाईयों ने कमेंट्स किये।
उनमें से आशीष जी ने कुछ प्रश्न किये, कुछ प्रतीक ने छाया भाई ने आरक्षण का विरोध किया तथा सृजन शिल्पी ने समर्थन किया। अब मैं आरक्षण विरोधियों के तर्कों के उत्तर देने के प्रयास करूंगा।

"""१.माना दलितो को आरक्षण नौकरी के लिये चाहिये, अब उन्हे पदोन्नति के लिये आरक्षण क्यों चाहिये ?"""
आशीष जी आरक्षण दलितों का सामाजिक स्तर सुधारने के लिये किया गया प्रयास है। पदोन्नति के लिये आरक्षण भी इसी कार्य का एक हिस्सा है। जिससे कि उंचे पदों पर भी पिछडी जातियों के लोग आयें ओर उनका प्रतिनिधित्व करे।

"""२.दलितो को शिक्षा के लिये आरक्षण दे दिया, पढ लिख गये, अब उच्च शिक्षा के लिये आरक्षण क्यो चाहिये ?"""
आरक्षण का प्रमुख उद्देश्य दलितों को शिक्षित करना है अब इसमें आप ये कहैं कि दलित को तो सिर्फ साक्षर करदो, तो फिर बाकी पढाई की भी क्या जरुरत है। दलित अपने स्तर पर किये प्रयासों द्वारा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता है क्योंकि अकसर दलित गरीब होता है।

"""३.पिता ने आरक्षण के द्वारा नौकरी पा ली, अब बच्चे को आरक्षण क्यों चाहिये ?
इसका जवाब बहुत आसान है। - पूत्र जिन्दगी भर पिता पर बोझ नहीं बन सकता, उसको भी घर को चलाना ही पडेगा। पिता के जमाने के कॉम्पीटीशन में ओर अभी के में कितना अन्तर है ये सभी जानते हैं। प्रतियोगिताओं में आरक्षित वर्गों कि मेरिट उंची होना प्रमाण है कि कॉम्पीटीशन बढ गया है। इसलिये बच्चे को आरक्षण की आवश्यकता है। हमारे देश में पिता का राशन कार्ड में नाम होने के बावजूद पुत्र व्यस्क होने पर अपना राशन कार्ड अलग बनाता है क्योंकि उसका संघर्ष उसका अपना होता है।

"""५.आप अपने आसपास मे आरक्षण द्वारा लाभित ऐसे व्यक्ति का नाम बता दिजिये जिसने अपनी जाति के उद्धार के लिये काम लिया हो ?
ऐसे हजारों लाखों लोग है जो अपनी जाति के उद्धार के लिये प्रयासरत हैं। जिनके नाम कोई नहीं जानता जिनके प्रयास कोई नहीं जान पा रहा।
कितने ही ऐसे भारतीय हैं जिन्होने स्वतंत्रता के आंदोलन में सक्रीय भुमिका निभाई पर क्या हम सबके नाम जानते हैं। हां पर मैं अवश्य ऐसे कई व्यक्तियों और संस्थाओं को जानता हूं जो अपनी जाति के उद्धार के लिये कार्य कर रहैं है।

"""६.किसी भी छात्रावास मे जाइये और किसी से भी पूछिये कि सरकार द्वारा दी जाने वाली स्कालरशीप के पैसो का ये छात्र क्या उपयोग करते है ?
मेरा आधा जीवन छात्रावास में गुजर गया। मैं जानता हूं कि किस प्रकार छात्र अपनी स्कालरशिप का उपयोग करता है। कुछ लोगो के गलत उपयोग को देखकर सभी को गाली नहीं दी जा सकती। लडके अपनी किताबें ओर साल भर के एक जोडी कपडे स्कालरशिप से खरीदते हैं। दलितों की स्थिती देखने के लिये उनमे रहना आवश्यक है।

"""७. आपके अनुसार मौजुदा आरक्षण व्यवस्था ने ५७ साल मे कुछ नही किया (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है), लेकिन क्यो ? क्या यह वर्तमान व्यवस्था की असफलता नही है ?
ये आपने सबसे अहम सबाल किया आशीष जी तथा ये प्रश्न मैने कई लोगों के मुह से सुना और पढा है।
इसके जवाब में मैं यह कहना चाहता हूं कि इतने सालों में आरक्षण व्यवस्था कुछ तो किया है। हां ज्यादा असर नहीं हुआ तथा (जातिवाद/छुवा छुत बरकरार है) लेकिन यह व्यवस्था कि असफलता नहीं है। व्यवस्था अपना कार्य कर रहीं है परन्तु इसकी गती धीमी है।
यदी कोई दवा किसी रोग को अत्यंत धीमे ठीक कर रही है और उसका असर नजर नहीं आरहा तो दवा बन्द नहीं की जाती बल्की उसकी मात्रा में ईजाफा कर दिया जाता है, रोगी को मरने के लिये नहीं छोड दिया जाता। एक और उदाहरण लो हमारा कोई कार्य सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही के कारण यदी धीमी गती से होता है या फिर होता ही नहीं है तो क्या हम प्रयास बन्द कर देते हैं। नहीं ना। तो फिर आरक्षण भी धीरे धीरे असर कर रहा है।

और प्रतीक भाई मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ कि वर्गों के मध्य संघर्ष तो सदियों से इस देश में चलता आरहा है, आरथक्षण से वह नहीं बडेगा। आरक्षण से दलितों की सामाजिक हैसियत मे सुधार आएगा। हां अन्य वर्ग उनकी ईज्जत करेंगें इसका मैं नहीं कह सकता। हां इतना कह सकता हूं कि जब तक इज्जत नहीं होगी आरक्षण मिलता रहेगा।
हो सकता है आने वाले 25 वर्षों में सभी वर्ग समान हो जाए तो तब इस आरक्षण कि जरूरत नहीं पडे। सृजन शिल्पी ने मेरे पोस्ट पर लिखा है कि यदि सामाजिक व्यवस्था के कर्णधारों ने संविधान के प्रावधानों को लागू करने में ईमानदारी और सदाशयता दिखाई होती तो शायद वैसे हालात काफी पहले ही पैदा हो सकते थे, और आरक्षण समाप्त हो सकता था।
आरक्षण योग्यता को नहीं खा रहा हैं बल्कि छुपे हुए योग्यता का विकास कर रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरक्षण किसी का हक नहीं है बल्कि यह तो प्रयास है पिछडों को उबारने का।

 

Wednesday, May 10, 2006

क्या वाकई में भारत में आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो गया है?

Wednesday, May 03, 2006 को मैनें मेरे चिठ्ठे आज का सवाल पर एक प्रश्न किया था कि क्या भारत में आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध होगया है?
और मुझे ramu_ag@yahoo.com द्वारा जवाब मिला था कि
"""अ.जा./अ.ज.जा. के कुछ व्यक्ति वर्तमान उच्च पदों पर हैं, कुछ अत्यन्त धनवान हैं, कुछ करोड़पति अरबपति हैं, फिर भी वे और उनके बच्चे आरक्षण सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, ऐसे सम्पन्न लोगों के लिए आरक्षण सुविधाएँ कहाँ तक न्यायोचित है? कब तक चलेगा ऐसा?"""
इसके बाद मैने कई चिठ्ठे पढे जो आरक्षण का विरोध कर रहै हैं। देश में आरक्षण का नाग फुंफकार रहा है, नेता जी ने आग को हवा दे है। जितना मैं पढ सका उतना पढने के बाद मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं या कि आरक्षित लोगों का। अभी दिल्ली में मेडिकल के छात्रों ने जुते साफ किये, झाडू लगाया।
मेरा कहना है कि जुते साफ करने वालों तथा झाडू लगाने वालों को अपमानित करना कहां तक न्यायोचित है?
ramu_ag@yahoo.com का कहना है कि आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो चुका है।
मैं सभी से पूछना चाहता हूं कि क्या वाकई में क्या वाकई में SC, ST, OBC में आने वाली जातियों का सामाजिक स्तर उठ गया है। क्या वाकई में इन लोगों को समाज में इज्जत की नजर से देखा जाता है?
आज सुबह जब मैं घर के बाहर आया तो मैने देखा कि हरिजन झाडू लगा रही थी और साथ में कचरा ट्राली लेकर चल रही थी मेरे पडोस की सभी महिलाएं ज्यादातर ब्राह्मण, जैन, राजपूत, वैश्य इत्यादी दो फीट दूर से ट्रोली में कचरा फैंक रहीं थी। थोडी देर बाद जब वो रोटी लेने आयी तो सारी महिलाएं उस हरिजन महिला के टोकरे में दूर से ही रोटीयां फैंक रही थी। वो महिलाएं उस हरिजन महिला के छूना नहीं चाहती थी। इसलिये दूर से ही रोटियां फैंक रहीं थी।
और ये घटना पूरे देश में रोज सवेरे घटती है।
तो फिर कहां से लोगों को लगता है कि इन लोगों का सामाजिक स्तर बढ गया है।
लोग उसके छूने से डर रहै हैं कि कहीं अपवित्र न हो जाए, क्योंकि वो मल मूत्र साफ करके आयी है।
मैं आपको एक द्श्य दिखाता हूं।
सोचिये कि एक ऐसा ब्राह्मण जो छूआछूत करता हो घायलावस्था में हाई-वे पर पडा है तथा दूर दूर तक कोई नजर नहीं आरहा और थोडी देर बाद एक ओर से कंधे पर झाडू उठाए एक हरिजन आरहा है वह घायल को देखते ही उसे बचाने कि सोचता है तथा घायल को कंधे पर उठाकर ले जाता है तो क्या वो घायल ब्राह्मण हरिजन से मना करेगा कि मुझे मत छू, पहले नहाकर आ?
आज भी देश के कई हिस्सों में रोज दलितों का अपमान होता है।
तो फिर कहां से इनका सामाजिक स्तर बढ गया है?
आज भी राजस्थान में कई जगह दलित दुल्हों को घोडी से उतार दिया जाता है।
क्या दलित हिन्दु नहीं है, क्या उन्हे घोडी पर बैठने का हक नहीं है ?
एसे ही कई कारण है जिस वजह से सरकार ने आरक्षण का प्रावधान कर इनका सामाजिक आर्थिक स्तर उठाने का कदम उठाया था।
राजस्थान की आज की खबर ही लो (सोजन्य से दैनिक भास्कर)
अल्लाह बख्श, जालोर, 9 मई। तिलोडा के राजकीय विध्यालय में मेघवाल समाज के पांच बच्चे पढ रहै हैं, जिनको विधालय के अध्यापक और प्रधानाध्यापक प्रताडित करते हैं, तथा जातिसूचक गालियां देते हैं। जब बच्चों ने ये बाते घर पर बताई तो  बच्चों के दादा अध्यापकों से मिले तो अध्यापकों ने उनके साथ भी गाली गलोज की।
दादा फिर कलेक्टर से मिले।
तथा अब जांच बैठा दी गई है।
पता नहीं क्या होगा इस जांच का?
इस देश के हर शहर गांव में कभी न कभी इस तरह की घटनाएं होती रहती है तो फिर कहां से आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध हो गया है।
लोग कहते हैं कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये जिससे कि वाकई में गरीबी दूर होगी(मेरा भी यही मानना है)।
लेकिन मैं ये कहता हूं कि ये कोन तय करेगा कि फलाना व्यक्ति गरीब है। जाहिर है कि ये कार्य सरकारी तंत्र द्वारा किया जाएगा तो क्या विश्वास किया जाए कि सरकारी लोग सही कार्य करेंगे।
पूरे देश में BPL सूचियां बनाई गयी लेकिन इसमें कई अमीरो ने भी अपने नाम जुडा लिये हैं।
सब ये जानते हैं कि फलानी जाती वाकई में निम्न जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। तो इसीलिये आरक्षण का आधार जातिगत रखा गया क्योंकि आज भी इस देश में कुछ लोगों को निम्न जाति का कह कर हैय द्ष्टी से दैखा जाता है।
आखिर में
मेरा मानना यह है आरक्षण का प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है।

Monday, May 08, 2006

खतरनाक बुढ्ढा Part Two (बुढ्ढों से सावधान) Harmful Oldman

आखिरकार हम अपनी हंसी को दबा नहीं पाये और सारे जोर जोर से हंसने लगे। बुढ्ढा भी अचकचाता हुआ नींद से जागने का नाटक करते हुए उठा।
उसने हमारी तरफ देखा, हम उसकी तरफ देखकर हंस रहै थे। तभी उसने आगे वाली सीट पर देखा तो पाया कि आगे तो लडका बैठा है। बेचारा बडा शर्मिंदा हुआ।
कोटा पहुंचने पर मैं लडकी के पास गया ओर मैने कहा कि क्या ये बुढउ तुम्हे परेशान कर रहा था तो उसने हामी में सर हिला दिया।
मैने उससे कहा कि जब हम कह रहै थे कि कोई परेशान कर रहा है तो फिर क्यों जवाब नहीं दिया। तो वो कुछ नहीं बोली। मैने उससे कहा कि "तुमने कुत्तों से सावधान" सुना होगा, अब नया सुनो बुढ्ढों से सावधान।
लडकी से मैने कहा कि यदी यही छेडखानी कोई लडका कर रहा होता तो तुम अभी तक उसके जूते पडवा देती फिर तुमने उसे क्यों बख्शा। लडकी निरुत्तर रही।
मैने आखिर उससे कहा कि अच्छा चलते हैं।
और मैं घर आगया अच्छी अच्छी यादें लिये।
 

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